


Ncrkhabar@NewDelhi. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित अख़बारों में शुमार वॉशिंगटन पोस्ट में हाल ही में हुई बड़ी छंटनी ने वैश्विक पत्रकारिता जगत को झकझोर कर रख दिया है। अख़बार ने अपने कुल स्टाफ का लगभग एक-तिहाई, यानी 300 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से बाहर कर दिया। इस छंटनी की चपेट में कांग्रेस सांसद शशि थरूर के बेटे और अख़बार के वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय स्तंभकार ईशान थरूर भी आ गए। ईशान ने इसे न्यूज़रूम और पत्रकारिता के लिए “बेहद दुखद दिन” करार दिया।
इसी बीच भारत के प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल एनडीटीवी (NDTV) को लेकर भी ऐसी ही चिंताजनक खबरें सामने आ रही हैं। सूत्रों के अनुसार एनडीटीवी में एक बार फिर बड़े स्तर पर पत्रकारों की छंटनी की तैयारी की जा रही है। बताया जा रहा है कि करीब 100 पत्रकारों और तकनीकी कर्मचारियों को एचआर विभाग की ओर से ई-मेल भेजे गए हैं। इन ई-मेल्स में इनपुट, आउटपुट, कैमरा, एमसीआर, पीसीआर और डिजिटल टीम सहित कई विभागों के कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन को लेकर चेतावनी दी गई है। खास बात यह है कि यह प्रक्रिया उस समय शुरू की गई है जब आमतौर पर संस्थानों में अप्रेज़ल की तैयारी होती है।
सूत्रों का कहना है कि कई ऐसे कर्मचारी भी इस कार्रवाई की जद में हैं जिन्हें पिछले वर्ष टॉप रेटिंग मिली थी, लेकिन मैनेजमेंट बदलते ही उन्हें कमजोर परफॉर्मर करार दिया जा रहा है। कर्मचारियों को आशंका है कि यह पूरी कवायद केवल नौकरी से बाहर करने की तैयारी है। बताया जाता है कि पुराने मैनेजमेंट से जुड़े कर्मचारियों को किनारे लगाने की प्रक्रिया पिछले साल जून से ही शुरू हो गई थी। कई पत्रकारों ने अपमानजनक व्यवहार और दबाव के चलते स्वयं ही संस्थान छोड़ दिया, जबकि जो बचे हैं उन्हें अब अलग-अलग तरीकों से परेशान किया जा रहा है। सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि नए और पुराने कर्मचारियों के बीच वर्क कल्चर, वीक-ऑफ और जिम्मेदारियों को लेकर भेदभाव किया जा रहा है। अनुभवी पत्रकारों को गैर-जरूरी कामों में उलझाया जा रहा है, जिससे चैनल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और ऑन-एयर गलतियां बढ़ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि भारी निवेश के बावजूद NDTV इंडिया की टीआरपी में कोई बड़ा सुधार देखने को नहीं मिला है। यानी करोड़ों-अरबों झोंकने के बाद भी न तो कंटेंट में दम नजर आ रहा है और न ही दर्शकों का भरोसा लौट पा रहा है। अरबों की संपत्ति के मालिक जेफ बेजोस हों या गौतम अडानी, सवाल यही है कि क्या मुनाफे और मैनेजमेंट बदलाव की कीमत हमेशा पत्रकारों की रोज़ी-रोटी ही चुकाएगी? जिन पत्रकारों के घर इन्हीं नौकरियों से चलते हैं, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जिम्मेदारियां इन्हीं वेतन पर टिकी होती हैं, उनके भविष्य का क्या होगा—यह सवाल आज पूरी मीडिया इंडस्ट्री के सामने खड़ा है।

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